इस जीवन में बैठे ठाले ऐसे भी क्षण आ जाते हैं,
जब हम अपने से ही अपनी बीती कहने लग जाते हैं;
तन खोया-खोया सा लगता है,
मन उर्वर सा हो जाता है;
लगता है सुख-दुःख की स्मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूं,
यूँ ही अकेलेपन में कुछ भाव-आभाव सुना डालूं;
जो भी ज़ख्म भरना होगा, चलते-चलते भर जायेगा,
रास्ते में सोचने बैठे तो जीना दूभर हो जायेगा;
कवि की अपनी सीमाएं हैं, कहता जितना कह पता है,
कितना भी कह डाले लेकिन, अनकहा अधिक रह जाता है...

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